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आस्था की अनूठी डोर: बाबा पशुपतिनाथ के लिए छोड़ा जयपुर का मायका, 19 वर्षों से 12 फीट की महा-राखी बांध रहीं अर्पणा
28 August 2026
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By HelloMandsaur Auto-Editor
मंदसौर के सुप्रसिद्ध अष्टमुखी भगवान पशुपतिनाथ मंदिर में इस बार भी रक्षाबंधन पर्व पर आस्था का एक अनोखा रंग देखने को मिला। स्थानीय निवासी अर्पणा पाठक ने अपनी 19 साल पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए बाबा पशुपतिनाथ के विशाल विग्रह पर 12 फीट लंबी विशेष राखी अर्पित की। इस भव्य और कलात्मक राखी को देखने और बाबा के दर्शन के लिए सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
मूल रूप से जयपुर की रहने वाली अर्पणा बताती हैं कि शादी के बाद जब वे मंदसौर आईं, तो उन्होंने बाबा पशुपतिनाथ को ही अपना भाई और रक्षक मान लिया। तब से लेकर आज तक, बीते 19 सालों में वे एक बार भी रक्षाबंधन पर अपने मायके जयपुर नहीं गईं। वे खुद अपने हाथों से हफ्तों की कड़ी मेहनत के बाद इस 12 फीट लंबी भव्य राखी को तैयार करती हैं, जिसमें रेशम के धागों के साथ-साथ पारंपरिक गोटे और धार्मिक कलाकृतियों का अत्यंत सुंदर उपयोग किया जाता है।
मंदिर के मुख्य पुजारियों की मौजूदगी में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा पशुपतिनाथ के मुख्य विग्रह पर यह रक्षासूत्र बांधा गया। अर्पणा के इस अनूठे संकल्प और समर्पण की चर्चा पूरे मालवा अंचल में कौतूहल और श्रद्धा का विषय बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच अटूट विश्वास की जीवंत मिसाल है, जो हर साल मंदसौर को गौरवान्वित करती है।
मूल रूप से जयपुर की रहने वाली अर्पणा बताती हैं कि शादी के बाद जब वे मंदसौर आईं, तो उन्होंने बाबा पशुपतिनाथ को ही अपना भाई और रक्षक मान लिया। तब से लेकर आज तक, बीते 19 सालों में वे एक बार भी रक्षाबंधन पर अपने मायके जयपुर नहीं गईं। वे खुद अपने हाथों से हफ्तों की कड़ी मेहनत के बाद इस 12 फीट लंबी भव्य राखी को तैयार करती हैं, जिसमें रेशम के धागों के साथ-साथ पारंपरिक गोटे और धार्मिक कलाकृतियों का अत्यंत सुंदर उपयोग किया जाता है।
मंदिर के मुख्य पुजारियों की मौजूदगी में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा पशुपतिनाथ के मुख्य विग्रह पर यह रक्षासूत्र बांधा गया। अर्पणा के इस अनूठे संकल्प और समर्पण की चर्चा पूरे मालवा अंचल में कौतूहल और श्रद्धा का विषय बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच अटूट विश्वास की जीवंत मिसाल है, जो हर साल मंदसौर को गौरवान्वित करती है।