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मजहब की दीवारें ढही: मंदसौर में 60 वर्षों से मुस्लिम भाई की कलाई पर सज रही हिंदू बहन की राखी, सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल
29 August 2026
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By HelloMandsaur Auto-Editor
मंदसौर शहर के हृदय स्थल में सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी बेमिसाल गाथा जीवंत है, जो नफरत की सियासत करने वालों को सीधे तौर पर खारिज करती है। यहाँ एक हिंदू बहन पिछले छह दशकों (60 साल) से अपने मुस्लिम भाई के घर पहुंचकर उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांध रही हैं। यह अटूट धागा दोनों परिवारों के बीच केवल एक रस्म नहीं, बल्कि दिलों के गहरे जुड़ाव और आपसी विश्वास की एक मजबूत नींव बन चुका है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस रिश्ते की शुरुआत करीब साठ साल पहले हुई थी। तब से लेकर आज तक, वक्त बदला और पीढ़ियां बदलीं, लेकिन इस रिश्ते की मिठास और पवित्रता में रत्ती भर भी कमी नहीं आई। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर बहन पूरे पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ भाई के घर पहुंचती हैं, तिलक लगाकर आरती उतारती हैं और कलाई पर राखी सजाती हैं। वहीं, मुस्लिम भाई भी अपनी इस हिंदू बहन की रक्षा का फर्ज ब बखूबी निभाते आ रहे हैं और हर सुख-दुख में ढाल बनकर खड़े रहते हैं।
इस अनोखे और गहरे पारिवारिक रिश्ते को देखने वाले स्थानीय प्रबुद्ध जन इसे मालवा की गंगा-जमुनी संस्कृति का सबसे सुंदर उदाहरण मानते हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में जहां छोटी-छोटी बातों पर दूरियां बढ़ जाती हैं, वहीं मंदसौर का यह परिवार नई पीढ़ी को यह सीख दे रहा है कि इंसानियत और आपसी प्रेम का रिश्ता हर मजहबी दीवार से कहीं ऊंचा और पवित्र होता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस रिश्ते की शुरुआत करीब साठ साल पहले हुई थी। तब से लेकर आज तक, वक्त बदला और पीढ़ियां बदलीं, लेकिन इस रिश्ते की मिठास और पवित्रता में रत्ती भर भी कमी नहीं आई। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर बहन पूरे पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ भाई के घर पहुंचती हैं, तिलक लगाकर आरती उतारती हैं और कलाई पर राखी सजाती हैं। वहीं, मुस्लिम भाई भी अपनी इस हिंदू बहन की रक्षा का फर्ज ब बखूबी निभाते आ रहे हैं और हर सुख-दुख में ढाल बनकर खड़े रहते हैं।
इस अनोखे और गहरे पारिवारिक रिश्ते को देखने वाले स्थानीय प्रबुद्ध जन इसे मालवा की गंगा-जमुनी संस्कृति का सबसे सुंदर उदाहरण मानते हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में जहां छोटी-छोटी बातों पर दूरियां बढ़ जाती हैं, वहीं मंदसौर का यह परिवार नई पीढ़ी को यह सीख दे रहा है कि इंसानियत और आपसी प्रेम का रिश्ता हर मजहबी दीवार से कहीं ऊंचा और पवित्र होता है।